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मंदिर में स्थापित शिवलिंग के विषय में जनश्रुति है कि त्रेता युग में प्रभु श्री रामचंद्र के अनुज शत्रुघ्न बाणासुर नामक राक्षस पर विजय प्राप्त करने के लिए इस परिसर में पधारे। उन्होंने ही यहां शिवलिंग की स्थापना कर पूजन किया। तत्पश्चात बाणासुर पर विजय प्राप्त की। स्थापित शिवलिंग का तत्कालीन नाम दीनानाथ रखा गया और उसी नाम से प्रसिद्ध हुआ। हजारों-हजारों वर्ष पुराना शिवलिंग होने कारण पाताल भेदी है।
आस्था के प्रतीक दियावां महादेव मंदिर का शिवलिंग स्वयं भू है। प्राचीन काल से ही यह मंदिर सिर्फ क्षेत्र के लिए ही नहीं बल्कि भदोही, वाराणसी, इलाहाबाद आदि जनपदों के लोगों के भी आराधना का केंद्र बना हुआ है। यह भव्य शिव मन्दिर दतांव-अरुआवा मार्ग पर बसुही नदी से सटा है। बसुही नदी मंदिर की छटा में चार चांद लगाती है।
यहां ऐसी मान्यता है कि जो भी सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करता है उसको मन वांछित फल अवश्य मिलता है। इसी कारण से यहां हर सोमवार एवं शुक्रवार को लगने वाले मेले में भारी भीड़ होती है। पूरे सावन माह में शिवभक्तों और कावरियों का तांता लगा रह रहता है।
मंदिर में स्थापित शिवलिंग के विषय में जनश्रुति है कि त्रेता युग में प्रभु श्री रामचंद्र के अनुज शत्रुघ्न बाणासुर नामक राक्षस पर विजय प्राप्त करने के लिए इस परिसर में पधारे। उन्होंने ही यहां शिवलिंग की स्थापना कर पूजन किया। तत्पश्चात बाणासुर पर विजय प्राप्त की। स्थापित शिवलिंग का तत्कालीन नाम दीनानाथ रखा गया और उसी नाम से प्रसिद्ध हुआ। हजारों-हजारों वर्ष पुराना शिवलिंग होने कारण पाताल भेदी है।
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